Thursday, 12 May 2016

भोजराज जी का शेखावत

     भोजराज जी का शेखावत

" दो उदयपुर ऊजला दो दातार अटल !
एक तो राणा जगतसिंह दुजो टोडरमल !!
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राजा रायसल दरबारी खंडेला के 12 पूत्रों को जागीर में अलग अलग ठिकाने मिले और यही से शेखावतों की विभिन्न शाखाओं का जन्म हुआ इन्हीं के पूत्रों में से एक भोजराज जी को उदयपुवाटी जागीर के रूप में मिली इन्हीं के वंशज भोजराज जी के शेखावत कहलाते हैं ।
भोजराज जी के पश्चात उनके पुत्र टोडरमल उदयपुर शेखावाटी के स्वामी बने ।
टोडरमल जी के 6 पुत्रों मे से एक झुंझार सिंह थे झुंझार सिंह जी सबसे वीर प्रतापी निडर कुशल यौध्दा थे उस समय गाँव केड पर नबाब का शासन था नबाब की बढती ताकत से टोडरमल जी परेशान थे काफी बुढे हो चूके थे इसलिए केड पर अघिकार नहीं कर पाऐ कहा जाता है कि टोडरमल जी मॄत्यु शय्या पर थे लेकिन मन में एक बैचेनी उन्हें दिन रात खटकती थी इससे उनके पैर सीधे नहीं हो रहे थे।
अन्तिम क्षण में टोडरमल जी ने झुंझार सिंह जी को अपने पास बुलाकर कहा बेटा में पैर सीधे कैसे करूं इनके केड अङ रही है और मूझे मौक्ष प्राप्ती नहीं मील रही है ।
झुंझार सिंह जी अपने पिता टोडरमल जी से कहा की आप टोडी पर चारपाई पर विश्राम करें ।
पिता की अंतिम ईच्छा सुनकर वीर क्षत्रिय पुत्र झुंझार सिंह जी तुरन्त केड पर आक्रमण कर दिया इस युद्ध में उन्होंने केड गाँव का बुरी तरह से नष्ट कर दिया जलते हुए केड की लपटों के उठते धुऐं को देखकर टोडरमल जी को ईच्छा शांति का अनुभव हुआ और मौक्ष प्राप्ती होकर स्वर्ग लोक को रूख किया।
झुंझार सिंह जी ने अपनी ठुकरानी गोङजी के नाम पर गुढा गौङजी का बसाया ।
** ठुकरानी गोङजी के पाँच पुत्र थे **
( 1 ) मोहन सिंह जी के दीपपुरा झेरली खुडानिया टीटङवाङ पोषाणा
में निवास करते है ।
( 2 ) रूप सिंह जी के चिचङोली छावसरी गुङा गुढा बाघोली पापङा भोजगढ गिरावङी खोह हुक्मपुरा लीला की ढाणी में निवास करते है ।
( 3 ) किशोर सिंह जी के नेवरी ककराना उदयपुरवाटी किशोरपुरा गुढा सेही बङी स्यालू नुनियाँ हीरवाणा में निवास करते है ।
( 4 ) सरदार सिंह जी के इन्द्रपूरा बागोरा में निवास करते है ।
( 5 ) भगवन्त सिंह जी के पौंख गुढा मणकसास नांगल भोजनगर चौरोङी लोसना सुरजनपुरा में निवास करते है ।

भोजराज सिंह शेखावत मणकसास

Monday, 28 March 2016

महाराव शेखाजी का घाटवा युद्ध


महाराव शेखाजी का घाटवा युद्ध

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एक स्त्री की मान रक्षा के लिए शेखाजी ने झुन्थर के कोलराज गौड़ का सर काट कर अपने अमरसर के गढ़ के सदर द्वार पर टंगवा दिया,ऐसा करने का उनका उद्देश्य उदंड व आततायी लोगों में भय पैदा करना था हालांकि यह कृत्य वीर धर्म के खिलाफ था शेखा जी के उक्त कार्य की गौड़ा वाटी में जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और गौड़ राजपूतों ने इसे अपना जातीय अपमान समझा,अनेक गौड़ योद्धाओ ने अपने सरदार का कटा सर लाने का साहसिक प्रयत्न किया लेकिन वे सफल नही हुए और गौंडो व शेखाजी के बीच इसी बात पर ५ साल तक खूनी संघर्ष चलता रहा आख़िर जातीय अपमान से क्षुब्ध गौड़ राजपूतों ने अपनी समस्त शक्ति इक्कट्ठी कर घाटवा नामक स्थान पर युद्ध के लिए राव शेखा जी को सीधे शब्दों में रण निमंत्रण भेजा
गौड़ बुलावे घाटवे,चढ़ आवो शेखा |
लस्कर थारा मारणा,देखण का अभलेखा ||

रण निमंत्रण पाकर शेखा जी जेसा वीर चुप केसे रह सकता था और बिखरी सेना को एकत्रित करने की प्रतीक्षा किए बिना ही शेखा जी अपनी थोडी सी सेना के साथ घाटवा पर चढाई के लिए चल दिए और जीणमाता के ओरण में अपने युद्ध सञ्चालन का केन्द्र बना घाटवा की और बढे ,घाटवा सेव कुछ दूर खुटिया तालाब (खोरंडी के पास )शेखा जी का गौडों से सामना हुवा ,मारोठ के राव रिडमल जी ने गौडों का नेत्रत्व करते हुए शेखा जी पर तीरों की वर्षा कर भयंकर युद्ध किया उनके तीन घटक तीर राव शेखा जी के लगे व शेखा जी के हाथों उनका घोड़ा मारा गया ,इस युद्ध में शेखा जी के ज्येष्ठ पुत्र दुर्गा जी कोलराज के पुत्र मूलराज गौड़ के हाथों मारे गए और इसके तुंरत बाद मूलराज शेखा जी के एक ही प्रहार से मारा गया | घोड़ा बदल कर रिडमल जी पुनः राव शेखा जी के समक्ष युद्ध के लिए खड़े हो गए ,गौड़ वीरों में जोश की कोई कमी नही थी लेकिन उनके नामी सरदारों व वीरों के मारे जाने से सूर्यास्त से पहले ही उनके पैर उखड़ गए और वे घाटवा के तरफ भागे जो उनकी रणनीति का हिस्सा था वे घाटवा में मोर्चा बाँध कर लड़ना चाहते थे ,लेकिन उनसे पहले शेखा जी पुत्र पूरण जी कुछ सैनिकों के साथ घाटवा पर कब्जा कर चुके थे |
खुटिया तालाब के युद्ध से भाग कर घाटवा में मोर्चा लेने वाले गौडों ने जब घाटवा के पास पहुँच कर घाटवा से धुंवा उठता देखा तो उनके हौसले पस्त हो गए और वे घाटवा के दक्षिण में स्थित पहाडों में भाग कर छिप गए शेखा जी के पुत्र पूरण जी घाटवा में हुए युद्ध के दौरान अधिक घायल होने के कारण वीर गति को प्राप्त हो गए | घायल शेखा जी ने शत्रु से घिरे पहाडों के बीच रात्रि विश्राम लेना बुधिसम्मत नही समझ अपने जीणमाता के ओरण में स्तिथ सैनिक शिविर में लोट आए इसी समय उनके छोटे पुत्र रायमल जी भी नए सेन्यबल के साथ जीणमाता स्थित सेन्य शिविर में पहुँच चुके थे ,गौड़ शेखा जी की थकी सेना पर रात्रि आक्रमण के बारे में सोच रहे थे लेकिन नए सेन्य बल के साथ रायमल जी पहुँचने की खबर के बाद वे हमला करने का साहस नही जुटा सके |
युद्ध में लगे घावों से घायल शेखा जी को अपनी मर्त्यु का आभास हो चुका था सो अपने छोटे पुत्र रायमल जी को अपनी ढाल व तलवार सोंप कर उन्होंने अपने उपस्थित राजपूत व पठान सरदारों के सामने रायमल जी को अपना उतराधिकारी घोषित कर अपनी कमर खोली ,और उसी क्षण घावों से क्षत विक्षत उस सिंह पुरूष ने नर देह त्याग वीरों के धाम स्वर्गलोक को प्रयाण किया ,जीणमाता के पास रलावता गावं से दक्षिण में आधा मील दूर उनका दाह संस्कार किया गया जहाँ उनके स्मारक के रूप में खड़ी छतरी उनकी गर्वीली कहानी की याद दिलाती है |
घाटवा का युद्ध सं.१५४५ बैशाख शुक्ला त्रतीय के दिन लड़ा गया था और उसी दिन विजय के बाद शेखा जी वीर गति को प्राप्त हुए | शेखा जी की म्रत्यु का संयुक्त कछवाह शक्ति द्वारा बदला लेने के डर से मारोठ के राव रिडमल जी गोड़ ने रायमल जी के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर और 51 गावं झुन्थर सहित रायमल जी को देकर पिछले पॉँच साल से हो रहे खुनी संघर्ष को रिश्तेदारी में बदल कर विवाद समाप्त किया |
संदर्भ - राव शेखा,शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास

एक प्रण

एक प्रण

राजकुल पत्रिका के जून के अंक में प्रकाशित

अगर खुन खोले रजपूती जागे तो प्रण करना ।
ना दहेज लेना ना मृत्युभोज में जाना ।।

क्या शाही दावते खत्म हो गई जो तू मृत्युभोज खाने चला,
क्या ब्राह्मण व शुद्र कम पङ गये जो यह कृत्य राजपूत करने चला ।
क्या आज दानवीर भिखारी बन गया जो दहेज मांगने चला,
क्या आज तेरी क्षत्रियता मर गई जो स्वाभीमान बेचने चला ।।

तुझे भी तो भगवान ने देवी समान बहन या भुआ दी होगी,
तेरे पिता ने भी तो उसकी शादी कर्ज लेकर ही की होगी ।
तो फिर क्यों तू एक और राजपूत परिवार को कर्ज तले दबाने चला ।।

धिक्कार है तेरे राजपूत होने पर !
धिक्कार है तेरे क्षत्रिय कहलाने पर !
जो तू देवी समान राजपूत कन्या कि बजाय,
उसके पिता से मिलने वाली दहेज की राशि से विवाह करने चला ।।

यदि अब भी तूने प्रण ना किया,
तो धिक्कार है उस क्षत्राणी को जिसने तुझे जन्म दिया ।।

written by  कुँवर भोजराज सिंह शेखावत मणकसास

नोट:- यहाँ ब्राह्मण व शुद्र शब्द से आशय किसी जाती विशेष से नहीं है । यहां पर्युक्त ब्राह्मण शब्द का आशय एक उस पवित्र वर्ग से है जिन्हें भोजन कराना हिन्दू धर्म में पुण्य का कार्य माना जाता है व शुद्र शब्द से आशय उन लोगों से हैं जिनकी प्राथमिक आवश्यकताएं (रोटी,कपड़ा,मकान) भी पूर्ण नहीं हो पाती है ।।

Saturday, 30 January 2016

क्षत्रिय/राजपूतों के लिए ध्यान में रखने योग्य कुछ बातें:

१- अपने पूर्वजों का सम्मान करें तथा अपने बच्चों को पूर्वजों की कथाओं/गुणों से परिचित कराएँ.
२- अपने-अपने घरों में महाभारत,गीता,रामायण एवं महापुरुषों से सम्बंधित गाथाएं आदि ग्रंथों को अवश्य रखें तथा बच्चों को कभी-कभी उसका पाठ करने के लिए प्रेरित करें तथा उसे आप भी सुनें. क्षत्रिय महापुरुषों का चित्र भी अपने घरों के दीवालों पर लगायें.
३- अपने बच्चों का नामकरण भी पूर्वजों के नाम के अनुरूप रखें तथा नाम के साथ अपनी क्षत्रियता की पहचान के लिए कुलों की उपाधियों को रखना न भूलें, क्योंकि यथानाम तथागुण चरितार्थ होती है. बच्चों में इससे क्षत्रियोचित गुणों का विकास होता है.
४- नाम भी ऐसा रखें जिससे बच्चे अपने आपको गौरवान्वित महसूस करें. नैतिक शिक्षा एवं अनुशासन का भी पाठ पढ़ायें तथा अपने बच्चों को आज्ञाकारी बनायें.
५-अपने वचन का पालन करें. आदर्श आचरण स्थापित करें तथा अच्छे आचरण के लिए बच्चों के साथ-साथ दूसरों को भी प्रेरित करें.
६- बच्चों को मर्यादा का उल्लंघन नहीं करने की शिक्षा दें तथा बड़ों का आदर करना सिखाएं.
७. बच्चों को पढने के साथ-साथ खेलने की भी पूरी आज़ादी दें तथा शारीरिक गठन के लिए व्यायाम खेलकूद के लिए भी प्रोत्साहित करें.
८- लड़कियों की शिक्षा में भी कोई कमी या कोताही नहीं बरतें तथा उन्हें हर तरह की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करें.
९- अगर संभव हो तो दहेज़ रहित शादी करें/कराएँ तथा आदर्श विवाह को प्रोत्साहित करें. शादी-विवाह सादगीपूर्ण तरीके से करें तथा अनावश्यक खर्चों से बचने का प्रयास करें. साधनविहीन एवं आर्थिक रूप से पिछड़े भाई बंधुओं को शादी विवाह आदि में यथासंभव सहयोग करें. सामूहिक शादी का आयोजन कर
फिजूलखर्ची से बच सकते हैं. यदि गाँव में एक ही समाज में कई घरों में शादियाँ हो तो सामूहिक पंडाल बनाकर और सामूहिक भोज का आयोजन कर फिजूलखर्ची पर रोक लगाया जा सकता है.
१०-क्षत्रिय/राजपूत कहने में गौरव का अनुभव करें. स्कूल/कॉलेज/घर/मकान/दुकान/मोहल्ला/मार्ग/संस्था/प्रतिष्ठान आदि का नामकरण भी अपने महापुरुषों के नाम पर करें या राजपूत से सम्बंधित कोई पहचान के नाम पर रखें ताकि क्षत्रियता/राजपूत होने का बोध हो.
११. संकोच या भय का सर्वथा परित्याग करें. साहस का परिचय दें. साहसी एवं दृढ निश्चयी बनें.
१२- पौराणिक परम्पराओं एवं मान्यताओं तथा कुल की मर्यादाओं का सख्ती से पालन करें/कराएँ.
१३- राजपूत जाति के लड़के या लड़कियों का विवाह राजपूत समाज में ही होना श्रयस्कर हो सकता है. अंतरजातीय विवाह संबंधों को कतई प्रोत्साहन नहीं दें. क्योंकि इसके गंभीर परिणाम भविष्य में सामने आते हैं.
१४- इतिहास प्रसिद्द महापुरुषों की जयंतियां सामूहिक रूप से मनाई जाय तथा उनके आदर्शों पर चलने का बार-बार संकल्प करें.
१५- जातीय जीवन को प्रेरणा देने वाले त्योहारों में सबसे महत्वपूर्ण है विजयादशमी का त्यौहार. क्षत्रियों/राजपूतों के लिए इस पर्व से बढ़कर कोई त्यौहार नहीं है. अतएव इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ सामूहिक रूप से मनाएं. इस अवसर पर शस्त्रास्त्र प्रदर्शन एवं सञ्चालन,प्रतिस्पर्धा, घुडदौड़, आखेट, सामूहिक खेल, सामूहिक भोज आदि का कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं.
१६- शस्त्रास्त्र निश्चित तौर पर प्रत्येक घरों में अवश्य रखा जाय एवं उसका प्रदर्शन समय-समय पर अवश्य करते रहें ताकि आपका मनोबल हमेशा बना रहे.
१७- शादी-विवाह, सभा-सम्मेलनों, सामूहिक त्योहारों में अपने पारम्परिक वेश-भूषा को अवश्य धारण करें. हमारी पारम्परिक वेश-भूषा पगड़ी,शेरवानी, धोती, कुर्ता और तलवार रहा है. अतः शादी-विवाह के अवसरों पर वर पक्ष एवं वधु पक्ष दोनों पारम्परिक वेश-भूषा का इस्तेमाल करें.
१८- सरकारी सेवा में, सेना में, या पुलिस में नौकरी करने वाले अनुशासन, ईमानदारी, कार्यदक्षता और सच्चरित्रता में अपने उच्चाधिकारियों एवं अपने सहयोगियों के सामने आदर्श प्रस्तुत करें, ताकि आपकी श्रेष्टता सब जगह सिद्ध हो सके. सबों को यह आभास हो कि आप सभी स्थानों पर महान क्षत्रिय/राजपूत चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसा कोई कार्य नहीं करें, जिससे उनकी महान परम्परा, स्थापित मर्यादा व जाति पर कलंक का धब्बा लगे तथा क्षत्रिय/राजपूत जाति बदनाम हो.
१९- नौकरी के अतिरिक्त व्यवसाय में भी ईमानदारी से धर्मपूर्वक धनार्जन करें. ठगने या धोखाघड़ी से धनार्जन का ख्याल मन में भी कभी न लायें.
२०- दलित वर्ग या श्रमजीवी वर्ग, दीन असहाय और पथ विचलित वर्ग की रक्षा कर न्याय और सच्चाई की रक्षा करना क्षात्र-धर्म का मूल सिद्धांत एवं कर्तव्य है, इसका अनुपालन करें.
२१-हमे इस बात का हमेशा ध्यान में रखना है कि क्षत्रिय/राजपूत एक विकसित जाति और कॉम है. हम सभी जातियों में श्रेष्ठ हैं, इसे कदापि नहीं भूलना चाहिए. आपके आचार-विचार से हमारा पूर्ण समाज, प्रदेश एवं राष्ट्र प्रभावित होता है. हिन्दू संस्कृति में जो भी नियम कायदे स्थापित हैं वह
क्षत्रियों/राजपूतों द्वारा स्थापित हैं इसलिए इसका उल्लंघन अपने निर्मित नियमों से ही विचलित होना है. अतएव इसका पालन करना और कराना हमारा पुनीत कर्त्तव्य है, हमारा दायित्व बनता है।

धरती माँ बोलो अवध के मेरे पुरुषोत्तम राम कहाँ?

धरती माँ बोलो अवध के मेरे पुरुषोत्तम राम कहाँ?
यमुना बोलो कालिया मर्दन करने वाले घनश्याम कहाँ?

भीष्म का शौर्य कहाँ, बलों के धाम बलराम कहाँ?
बोलो मेवाड़ फिर एकबर मेरा महाराणा संग्राम कहाँ?

राजस्थान के कण-कण बोलो महाराणा प्रताप कहाँ?
अरावली की मिटटी बोलो झाला का अपूर्व त्याग कहाँ?

कहाँ है अर्जुन का गांडीव भीमसेन का बल अपार कहाँ?
धर्मराज का वह भाला अभिमन्यु की तलवार कहाँ?

कहाँ है कर्ण की दानवीरता कवच और कुंडल कहाँ?
राजा जनक की बाणी विश्वामित्र का कमंडल कहाँ?

दिल्ली बोलो पृथ्वीराज का है शब्दवेदी वाण कहाँ?
कहाँ हैं मालवा के परमार दिल्ली के चौहान कहाँ?

वसुधा बोलो आल्हा उदल का विजय अभियान कहाँ?
धरती कहाँ है उनकी कन्नौज और वीर मलखान कहाँ?

कहाँ बालक भरत की वीरता छ्त्रशाल का शौर्य कहाँ?
बिहार की धरती बोलो अशोक चन्द्रगुप्त मौर्य कहाँ?

कहाँ है लवकुश की वीरता वीर बालक चंड का त्याग?
कहाँ खो गयी धरती में क्षत्राणियों का शौर्य सुहाग?

मातृभूमि पर शीश चढाने वाली कहाँ है हाडा रानी?
जौहर व्रत को जन्म देने वाली कहाँहैं पद्मिनी रानी?

कहाँ है वीर कुंवर का खडग रानी लक्ष्मी की तलवार?
गूंज रहा अभी भी कण कण में कुंवर सिंह की ललकार?

वीर शिवाजी छत्रशाल दुर्गादास अमरसिंह राठौड़ कहाँ?
कहाँ छिपे हैं इतने वीर सारे बड़ादो उनका ठौर कहाँ?

खोज लायुं उन्हें धरती पर माँ मुझे तुम बतला दो,
धरती फिर वीरों से भर जाये मेरे मन को बहला दो,

द्रुम कुसुम सभी मुरझा गए आज वनदेवी श्रीहीन हुयी,
क्षत्रियो का मुख निस्तेज है वसुधा वीर विहीन हुयी,

धरती माँ बोलो क्या लौटेगी क्षत्रियों की शान नहीं?
एकबार फिर से क्या जागेगा वीरभूमि राजस्थान नहीं?

जय महाराणा प्रताप

मुगल काल में पैदा हुआ वो बालक कहलाया राणा
होते जौहर चित्तौड़ दुर्ग फिर बरसा मेघ बन के राणा

हरमों में जाती थीं ललना बना कृष्ण द्रौपदी का राणा
रौंदी भूमि ज्यों कंस मुग़ल बना कंस को अरिसूदन राणा

छोड़ा था साथियों ने भी साथ चल पड़ा युद्ध इकला राणा
चेतक का पग हाथी मस्तक ज्यों नभ से कूद पड़ा राणा

मानसिंह भयभीत हुआ जब भाला फैंक दिया राणा
देखी शक्ति तप वीर व्रती हाथी भी कांप गया राणा

चहुँ ओर रहे रिपु घेर देख सोचा बलिदान करूँ राणा
शत्रु को मृगों का झुण्ड जान सिंहों सा टूट पड़ा राणा

देखा झाला यह दृश्य कहा अब सूर्यास्त होने को है
सब ओर अँधेरा बरस रहा लो डूबा आर्य भानु राणा

गरजा झाला के भी होते रिपु कैसे छुएगा तन राणा
ले लिया छत्र अपने सिर पर अविलम्ब निकल जाओ राणा

हुंकार भरी शत्रु को यह मैं हूँ राणा मैं हूँ राणा
नृप भेज सुरक्षित बाहर खुद बलि दे दी कह जय हो राणा
कह नमस्कार भारत भूमि रक्षित करना रक्षक राणा!

चेतक था दौड़ रहा सरपट जंगल में लिए हुए राणा
आ रहा शत्रुदल पीछे ही नहीं छुए शत्रु स्वामी राणा

आगे आकर एक नाले पर हो गया पार लेकर राणा
रह गए शत्रु हाथों मलते चेतक बलवान बली राणा
ले पार गया पर अब हारा चेतक गिर पड़ा लिए राणा
थे अश्रु भरे नयनों में जब देखा चेतक प्यारा राणा

अश्रु लिए आँखों में सिर रख दिया अश्व गोदी राणा
स्वामी रोते मेरे चेतक! चेतक कहता मेरे राणा!

हो गया विदा स्वामी से अब इकला छोड़ गया राणा
परताप कहे बिन चेतक अब राणा है नहीं रहा राणा

सुन चेतक मेरे साथी सुन जब तक ये नाम रहे राणा
मेरा परिचय अब तू होगा कि वो है चेतक का राणा!

अब वन में भटकता राजा है पत्थर पे सोता है राणा
दो टिक्कड़ सूखे खिला रहा बच्चों को पत्नी को राणा

थे अकलमंद आते कहते अकबर से संधि करो राणा
है यही तरीका नहीं तो फिर वन वन भटको भूखे राणा

हर बार यही उत्तर होता झाला का ऋण ऊपर राणा
प्राणों से प्यारे चेतक का अपमान करे कैसे राणा

एक दिन बच्चे की रोटी पर झपटा बिलाव देखा राणा
हृदय पर ज्यों बिजली टूटी अंदर से टूट गया राणा

ले कागज़ लिख बैठा, अकबर! संधि स्वीकार करे राणा
भेजा है दूत अकबर के द्वार ज्यों पिंजरे में नाहर राणा

देखा अकबर वह संधि पत्र वह बोला आज झुका राणा
रह रह के दंग उन्मत्त हुआ कह आज झुका है नभ राणा

विश्व विजय तो आज हुई बोलो कब आएगा राणा
कब मेरे चरणों को झुकने कब झुक कर आएगा राणा

पर इतने में ही बोल उठा पृथ्वी यह लेख नहीं राणा
अकबर बोला लिख कर पूछो लगता है यह लिखा राणा

पृथ्वी ने लिखा राणा को क्या बात है क्यों पिघला राणा?
पश्चिम से सूरज क्यों निकला सरका कैसे पर्वत राणा?

चातक ने कैसे पिया नदी का पानी बता बता राणा?
मेवाड़ भूमि का पूत आज क्यों रण से डरा डरा राणा?

भारत भूमि का सिंह बंधेगा अकबर के पिंजरे राणा?
दुर्योधन बाँधे कृष्ण तो क्या होगी कृष्णा रक्षित राणा?

अब कौन बचायेगा सतीत्व अबला का बता बता राणा?
अब कौन बचाए पद्मिनियाँ जौहर से तेरे बिन राणा?

यह पत्र मिला राणा को जब धिक्कार मुझे धिक्कार मुझे
कहकर ऐसा वह बैठ गया अब पश्चाताप हुआ राणा

चेतक झाला को याद किया फिर फूट फूट रोया राणा
बोला इस पापकर्म पर तुम अब क्षमा करो अपना राणा

और लिख भेजा पृथ्वी को कि नहीं पिघल सके ऐसा राणा
सूरज निकलेगा पूरब से, नहीं सरक सके पर्वत राणा

चातक है प्रतीक्षारत कि कब होगी वर्षा पहली राणा
भारत भूमि का पुत्र हूँ फिर रण से डरने का प्रश्न कहाँ?

भारत भूमि का सिंह नहीं अकबर के पिंजरे में राणा
दुर्योधन बाँध सके कृष्ण ऐसा कोई कृष्ण नहीं राणा

जब तक जीवन है इस तन में तब तक कृष्णा रक्षित राणा
अब और नहीं होने देगा जौहर पद्मिनियों का राणा!

किसका भला किया है दारू ने

किसका भला किया है दारू ने
बुद्धि का हरण किया है दारूने
पैसा का हरण किया है दारूने
झगड़ो को जन्म दिया है दारूने
बच्चों को रूलाया दारू ने
घरों को उजाड़ा हैं दारू ने

इंसान को हैवान बनाया है दारू ने
सीख लिया जिसने पीना दारू को
समझो किनारा आ गया है जीवन का
पहले लोग पीना सीखते हैं दारू को
फिर पीने लगती है दारू इंसान को
ए मूर्ख पीने वाले दारू को

कुछ सोचो समझो विचार करो
न बनाओ अपने बच्चों को अनाथ
दुनिया न देगी कभी उनका साथ
अभी समय है करो प्रतीज्ञा आज
न पियेगे न पिलायेगे कभी दारू आप

बहुत हो गया ये पिना पिलाना
मत मानो इसे मान मनवार
अब सिर्फ नफरत करो दारू से
हम राजपूतो ने बहुत कुछ खो दिया है इस दारू से
अब हमेंखोया हुआ स्वाभिमान पाना है।

शेखावत या शेखावत सूर्यवंशी कछवाह

शेखावत या शेखावत सूर्यवंशी कछवाह राजपूत - सूर्य वंश - कछवाह - शाखा - शेखावत कछवाह शेखावत -  शेखा जी  के वंशज शेखावत कहलाते हैँ। शेखा जी ...