Monday, 18 January 2016

झाँसी की रानी – खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी

झाँसी की रानी

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।
महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

सुभद्रा कुमारी चौहान

Monday, 11 January 2016

खेतडी दरबार राजा अजीत सिंह जी

राजा अजीत सिंह का जन्म 16 अक्टूबर 1861 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित अलसीसर नामक स्थान पर हुआ था।
उनके पिता का नाम ठाकुर छत्तू सिंह था। जब खेतड़ी के तत्कालीन राजा फतेह सिंह का देहांत हुआ तो अजीत सिंह 1870 में खेतड़ी के राजा बने। उन्हें गोद लिया गया था।

साल 1876 में उनका विवाह रानी चंपावतजी साहिबा के साथ हुआ। उनके एक बेटा और दो बेटियां थीं। अजीत सिंह स्वामी विवेकानंद के प्रिय शिष्य ही नहीं बल्कि उनके सबसे करीबी मित्र भी थे। 
स्वामीजी अपने जीवन में तीन बार खेतड़ी आए। पहले 1891 में, फिर विश्वधर्म सम्मेलन में जाने से पहले 1893 में और आखिरी बार 1897 में।

जब स्वामीजी ने अपने व्याख्यान से अमेरिका में विजय परचम फहराया तो सबसे ज्यादा प्रसन्नता राजा अजीत सिंह को हुई। इस खुशी में खेतड़ी में घी के दीपक जलाए गए और दीपावली मनाई गई। 

इतने दानवीर थे राजा अजीत सिंह
स्वामीजी महान सिद्ध पुरुष थे। उनका ज्ञान, उच्च चरित्र और निष्कलंक जीवन देखकर ही राजा अजीत सिंह उनके शिष्य बने थे। जब स्वामीजी विश्वधर्म सम्मेलन में भाग लेने अमेरिका जा रहे थे तब अजीत सिंह ने उनसे कहा था कि आपके मार्गव्यय के पुण्य कार्य का सौभाग्य खेतड़ी को प्राप्त करने दीजिए। 

और उन्होंने स्वामीजी के लिए संपूर्ण राशि का प्रबंध किया। राजा अजीत सिंह बहुत बड़े दानवीर भी थे। कम ही लोग यह जानते होंगे कि स्वामीजी के पिता का देहांत होने के बाद उनके परिवार को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अजीत सिंह ने उनके परिवार की बहुत मदद की।

इस राजा का आज भी है बहुत सम्मान
इस स्थिति में राजा अजीत सिंह हर माह उनके परिवार को 100 रुपए भेजा करते थे, लेकिन उन्होंने कभी इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं बनाया और कभी इसका जिक्र नहीं किया।

एक ओर जहां ब्रिटिश काल में कई राजा-महाराजा अपनी प्रजा पर जुल्म करते थे, वहीं राजा अजीत सिंह को अपनी प्रजा से बहुत प्रेम था। यही वजह है कि आज भी खेतड़ी के लोग अपने इस राजा का नाम आदर से लेते हैं।
खेतड़ी के ठाकुर को कोटपुतली का परगना और राजा बहादुर का उपटंक प्राप्त होने पर उनकी प्रतिष्ठा में और वृद्धि हुई। यहाँ के पांचवें शासक राजा फतहसिंह के बाद राजा अजीतसिंह अलसीसर से दत्तक आकर खेतड़ी की गद्दी पर आसीन हुये। वे अपने सम-सामयिक राजस्थानी नरेशों और प्रजाजनों में बड़े लोकप्रिय शासक थे। वे जैसे प्रजा हितैषी, न्याय प्रिय, कुशल प्रबंधक, उदारचित्त थे, वैसे ही विद्वान, कवि और भक्त हृदय भी थे। राजस्थान के अनेक कवियों ने राजा अजीतसिंह की विवेकशीलता, न्यायप्रियता और गुणग्राहकता की प्रशंसा की है।
राजा अजीत सिंह संगीत के भी बड़े ज्ञाता थे। जब वे वीणा वादन करते थे तब स्वामी विवेकानन्द “प्रभु मोरे अवगुन चित्त न धरो” पद को बार-बार घंटों गाते रहते थे और दोनों अभिन्न हृदय झूम उठते थे। राजा अजीतसिंह एक न्याय प्रिय शासक ही नहीं अपितु, भक्त एवं दार्शनिक विद्वान थे। शेखावाटी के साहित्यकारों, धनाढ्यों और राजा खेतड़ी ट्रस्ट को इस महान विभूति के साहित्य का प्रकाशन करना चाहिए। 

राजा अजीतसिंह के एक अप्रकाशित भक्ति पद की कुछ पंक्तियाँ- 
अब पिय पायो री मेरो, मैं तो कीन्हों बहुत ढंढेरो। 
दृढ विराग को पिलंग बिछायो, दीपक ज्ञान उजेरो।। 
करुणा आदि सखी चहुँ औरी, आनन्द भयो घनेरो। 
भेद दीठ वह सोति भरी तब, मिल गयो घर को नेरो।। 
ताहि रिझाय करुँगी मैं अपनो, अपनो आपो हेरो।
नाहीं गिनो लगन निशि वासर, नाहीं न सांझ सवेरो।। 
खुद मस्ती मद प्यालो पीके, दूजों भयो न फेरो। 
घिल मिल हो के रंग में छाकी, तेरो रह्यो न मेरो।।

कवि और भक्त हृदय राजा अजीतसिंह ने उपर्युक्त पद में पिता परमेश्वर को पति रूप में स्मरण कर रूपक बाँधा है। इसमें वैराग्य रूपी पलंग बिछाया है और उसमें ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश किया है। दया और करुणा रूपी सखियों को साथ लेकर भेद रूपी सौतन को मारकर निर्भयता प्राप्त की है। अब उनके बीच कोई भी बाधक नहीं बचा है। खुद मस्ती के मद के चषक का पान कर मस्त हो जाना प्रकट किया है और द्वैत भाव को नष्ट कर दिया है।

गुरु-शिष्य में यह भी है एक समानता
लेकिन राजा अजीत सिंह की आयु अधिक नहीं रही। 18 जनवरी 1901 को उत्तरप्रदेश के सिकंदरा में उनका देहांत हो गया। यानी स्वामीजी के जन्मदिवस (12 जनवरी) से ठीक छह दिन बाद।

इसके अलावा दोनों में एक और समानता है। अपने शिष्य की मृत्यु से स्वामीजी को भी बहुत दुख हुआ और अगले ही साल वे भी (4 जुलाई 1902) ब्रह्मलीन हो गए। स्वामी जी ने स्वीकार किया है कि उनकी सफलता में राजा अजीत सिंह का अत्यधिक योगदान था। जब भी स्वामीजी की कीर्ति और यश का जिक्र किया जाएगा, राजा अजीत सिंह का नाम अवश्य आएगा।

शेखावाटी

                शेखावाटी
आपने नरेश सिंह जी का ब्लॉग मेरी शेखावाटी जरुर देखा होगा, मेरे भी कई लेखों में शेखावाटी नाम का जिक्र भी कभी पढ़ा होगा | और राजस्थान के संपर्क नहीं आये लोगों में इस नाम के प्रति जिज्ञसा जरुर हुई होगी कि आखिर ये शेखावाटी है क्या ?
तो आइए आज शेखावाटी के परिचय और इसके इतिहास पर कुछ चर्चा करली जाये |
राजस्थान के वर्तमान सीकर और झुंझुनू जिले शेखावाटी के नाम से जाने जाते है इस क्षेत्र पर आजादी से पहले शेखावतक्षत्रियों का शासन होने के कारण इस क्षेत्र का नाम शेखावाटी प्रचलन में आया |
देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर-शाहपुरा,खंडेला,सीकर,खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ,नवलगढ़,मंडावा, मुकन्दगढ़,दांता,खुड,खाचरियाबास,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ आदि बड़े-बड़े प्रभावशाली संस्थान शेखा जी के वंशधरों के अधिकार में थे | आज शेखावाटी क्षेत्र पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र में तेजी से उभर रहा है यहाँ पिलानी और लछमन गढ़ के भारत प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र है वही नवलगढ़,फतेहपुर,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ , मंडावा आदि जगहों पर बनी प्राचीन बड़ी-बड़ी हवेलियाँ अपनी विशालता और भित्ति चित्रकारी के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिन्हें देखने देशी-विदेशी पर्यटकों का ताँता लगा रहता है |

पहाडों में सुरम्य जगहों बने जीणमाता मंदिर,शाकम्बरीदेवी का मन्दिर,लोहार्ल्गल के अलावा खाटू में बाबा श्याम का (बर्बरीक) का मन्दिर,सालासर में हनुमान जी का मन्दिरआदि स्थान धार्मिक आस्था के ऐसे केंद्र है जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शनार्थ आते है | इस शेखावाटी प्रदेश ने जहाँ देश के लिए अपने प्राणों को बलिदान करने वाले देशप्रेमी दिए वहीँ उद्योगों व व्यापार को बढ़ाने वाले सैकडो उद्योगपति व व्यापारी दिए जिन्होंने अपने उद्योगों से लाखों लोगों को रोजगार देकर देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दिया | भारतीय सेना को सबसे ज्यादा सैनिक देने वाला झुंझुनू जिला शेखावाटी का ही भाग है | शेखावाटी क्षेत्र व उसके इतिहास के बारे में प्रस्तुत है कुछ देसी-विदेशी विद्वानों व इतिहासकारों द्वारा दी गई जानकारी --

राजस्थान का मरुभूमि वाला पुर्वोतरी एवं पश्चिमोतरी विशाल भूभाग वैदिक सभ्यता के उदय का उषा काल माना जाता है | हजारों वर्ष पूर्व भू-गर्भ में विलुप्त वैदिक नदी सरस्वती यहीं पर प्रवाह मान थी ,जिसके तटों पर तपस्यालीन आर्यऋषियों ने वेदों के सूत्रों की सरंचना की थी | सिन्धुघाटी सभ्यता के अवशेषों एवं विभिन्न संस्कृतियों के परस्पर मिलन,विकास उत्थान और पतन की रोचक एवं गौरव गाथाओं को अपने विशाल आँचल में छिपाए यह मरुभूमि भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय की श्र्ष्ठा और द्रष्टा रही है | जनपदीय गणराज्यों की जन्म स्थली और क्रीडा स्थली बने रहने का श्रेय इसी मरुभूमि को रहा है | इस मरुभूमि ने ऐसे विशिष्ठ पुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कार्यकलापों से भारतीय इतिहास को प्रभावित किया है |
इसी मरुभूमि का एक भाग प्रमुख भाग शेखावाटी प्रदेश है जो विशालकाय मरुस्थल के पुर्वोतरी अंचल में फैला हुआ है | इसका शेखावाटी नाम विगतकालीन पॉँच शताब्दियों में इस भू-भाग पर शासन करने वाले शेखावत क्षत्रियों के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है | उससे से पूर्व अनेक प्रांतीय नामो से इस प्रदेश की प्रसिद्दि रही है | इसी भांति अनेक शासक कुलों ने समय-समय पर यहाँ राज्य किया है |
सुरजन सिंह शेखावत
(प्रसिद्ध इतिहासकार ) 

वीर भूमि शेखावाटी प्रदेश की स्थापनामहाराव शेखा जी एवं उनके वंशजों के बल,विक्रम,शोर्य और राज्याधिकार प्राप्त करने की अद्वितीय प्रतिभा का प्रतिफल है यहाँ के दानी-मानी लक्ष्मी पुत्रों,सरस्वती के अमर साधकों तथा शक्ति के त्यागी-बलिदानी सिंह सपूतों की अनोखी गौरवमयी गाथाओं ने इसकी अलग पहचान बनाई और स्थाई रूप देने में अपनी त्याग व तपस्या की भावना को गतिशील बनाये रखा | यहाँ के प्रबल पराक्रमी,सबल साहसी,आन-बान और मर्यादा के सजग प्रहरी शूरवीरों के रक्त-बीज से शेखावाटी के रूप में यह वट वृक्ष अपनी अनेक शाखाओं प्रशाखाओं में लहराता,झूमता और प्रस्फुटित होता आज भी अपनी अमर गाथाओं को कह रहा है | शेखावाटी नाम लेने मात्र से ही आज भी शोर्य का संचार होता है,दान की दुन्दुभी कानों में गूंजती है और शिक्षा,साहित्य,संस्कृति तथा कला का भाव उर्मियाँ उद्वेलित होने लगती है | यहाँ भित्तिचित्रों ने तो शेखावाटी के नाम को सारे संसार में दूर-दूर तक उजागर किया है | यह धरा धन्य है | ऋषियों की तपोभूमि रही है तो कृषकों की कर्मभूमि | यह धर्मधरा राजस्थान की एक पुण्य स्थली है |
ऐतिहासिक द्रष्टि से इसमें अमरसरवाटी,झुंझुनू वाटी,उदयपुर वाटी, खंडेला वाटी, नरहड़ वाटी,सिंघाना वाटी,सीकर वाटी,फतेहपुर वाटी, आदि कई भाग परिणित होते रहे है | इनका सामूहिक नाम ही शेखावाटी प्रसिद्ध हुआ | जब शेखावाटी का अपना अलग राजनैतिक अस्तित्व था तब उसकी सीमाए इस प्रकार थी -- उत्तर पश्चिम में भूतपूर्व बीकानेर राज्य,उत्तरपूर्व में लोहारू और झज्जर,दक्षिण पूर्व में तंवरावाटी और भूतपूर्व जयपुर राज्य तथा दक्षिण पश्चिम में भूतपूर्व जोधपुरराज्य | परन्तु इसकी भौगोलिक सीमाएं सीकर और झुंझुनू दो जिलों तक ही सिमित मानी जाती रही है | वर्तमान शासन व्यवस्था में भी इन दो जिलो को ही शेखावाटी माना गया है | देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर-शाहपुरा,खंडेला,सीकर,खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ,नवलगढ़,मंडावा, मुकन्दगढ़, दांता, खुड, खाचरियाबास,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ आदि बड़े-बड़े प्रभावशाली संस्थान शेखा जी के वंशधरों के अधिकार में थे |
डा.उदयवीर शर्मा 
शेखावत संघ ने,जो आमेर राजवंश से उदभूत है ,काल और परिस्थितियों के प्रभाव से अपने पैत्रिक राज्य आमेर के बराबर सम्मान और शक्ति संचय कर ली है |
यधपि इस संघ का न कोई लिखित कानून है और न इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कोई प्रधानाध्यक्ष है | किन्तु समान हित की भावना से प्रेरित यह संघ अपना अस्तित्व बनाये रखने में सदैव समर्थ रहा है | फिर भी यह नहीं मान लेना चाहिय कि इस संघ में कोई नीति-कर्म नहीं है | जब कभी एक छोटे से छोटे सामंत के स्वत्वधिकारों के हनन का प्रश्न उपस्थित हुआ तो छोटे-बड़े सभी शेखावत सामंत सरदारों ने उदयपुर नामक अपने प्रसिद्ध स्थान पर इक्कठे होकर स्वत्व-रक्षा का समाधान निकाला है |
( कर्नल जेम्स टोड )
जिस काल का हम वर्णन कर रहे है,शेखावाटी प्रदेश ठिकानों (छोटे उप राज्यों ) का एक समूह था,जिसके उत्तर पश्चिम में बीकानेर,उत्तर पूर्व में लोहारू और झज्जर ,दक्षिण पूर्व में जयपुर और पाटन तथा दक्षिण पश्चिम में जोधपुर राज्य था | थार्टन के अनुसार शेखावाटी का क्षेत्रफल ३८९० वर्ग मील है जो भारतीय जनगणना रिपोर्ट १९४१ के आंकडों के लगभग बराबर है भारतीय जनगणना रिपोर्ट १९४१ के अनुसार शेखावाटी का क्षेत्रफल ३५८० वर्ग मील है | कर्नल टोड ने शेखावाटी का क्षेत्रफल ५४०० वर्ग मील होने का अनुमान लगाया है जो अतिशयोक्तिपूर्ण एवं अविश्वसनीय है |
अपनी अन-उपजाऊ प्राकृतिक स्थिति के कारण शेखावाटी सदैव से योद्धाओं,साहसिकों और दुर्दांत डाकुओं की भूमि रही है | शेखावाटी जयपुर राज्य में सदैव तूफान का केंद्र बनी रही और समय-समय पर जयपुर के आंतरिक शासन में ब्रिटिश हस्तेक्षेप के लिए अवसर जुटाती रही |
(एच.सी.बत्रा, M.A. इतिहास )
जयपुर,मारवाड़ और मेवाड़ की भांति शेखावाटी राजनैतिक और भौगोलिक द्रष्टि से एक प्रथक प्रदेश है | शेखावाटी के चीफ लोग जयपुर राज्य की सहायक सैनिक जाति के है और वे नाम मात्र को जयपुर राज्य के अधीन है |
(हेमिल्टन का हिन्दुस्थान भाग -१ )
रसाले (घुड़सवार सेना ) की भर्ती के हेतु शेखावाटी के मुकाबले समस्त भारत में कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है |
(कर्नल जे.सी.ब्रुक )
शेखावाटी के बारे में बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी अपने बदलते द्रश्य नामक पुस्तक में लिखते है |
मैंने मोकल के पुत्र राव शेखा को देखा जिसके बल विक्रम से नए राज्य की नीव लग रही थी | साथ ही मैंने बीस सवारों के साथ रायसल दरबारी को देखा जिसने अकथनीय पराक्रम से शत्रु सेनापति का सर काट डाला और मंत्री देवीदास के इस कथन की सिद्दि प्राप्त की कि " पिता की सम्पति पर अधिकार करने की अपेक्षा अपने ही बल पराक्रम से सौभाग्य का उपार्जन मनुष्य का कर्तव्य है -यही जगदीश्वर का अनुग्रह है " उसी जगदीश्वर का अनुग्रह मैंने रायसल के पुत्र द्वारकादास पर देखा जिसके सिंह से युद्ध के लिए उद्दत होने पर लड़ने की अपेक्षा वही शेर उनके तलवे चाटने लगा | मैंने भोजराज के वंशज नव-विवाहित सुजान सिंह को खंडेला के मंदिर की रक्षा करते देखा | उसे पुरे यौवन के अधूरे अरमानो के साथ अकेले ही सैकडो यवनों को मसलते देखा | धरा धर्म की मांग पर प्राणोत्सर्ग के कर्तव्य का इतिहास में अमूल्य प्रष्ठ जुड़ते देखा | वे माताएं होगी जिन्होंने इस प्रकार के नव-रत्नों को जन्म दिया है | मैंने केसरी सिंह को देखा जिसने सैयद अब्दुल्ला द्वारा भेजी गई शाही सेना का मुकाबला करने के लिए समस्त शेखावाटी को एक सूत्र में बांध दिया और जब वह सूत्र टूटने लगा तो युद्ध से भागने की सलाह को अस्वीकार करते कहा था कि ऐसा कलंक मै अपने ऊपर कभी नहीं लगाना चाहता जिसे मेरी आने वाली पीढियां भी नहीं धो सकती | उसी केसरी सिंह को अंत में मेदिनी माता को अपने ही रक्त मांस व मिटटी से पिंडदान करते देखा | मैंने अनेक बार खंडेला को उठते गिरते लडखडाते और लड़ते देखा | शार्दुल सिंह शेखावत जैसे जीवट के खिलाडियों को देखा,खेल के मैदानों को देखा,खेलों को देखा और छोटी-छोटी बातों में जीवन की महानताओं को गोते लगाते देखा और मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा वाह शेखावाटी ! वाह !! 

शेखावत या शेखावत सूर्यवंशी कछवाह

शेखावत या शेखावत सूर्यवंशी कछवाह राजपूत - सूर्य वंश - कछवाह - शाखा - शेखावत कछवाह शेखावत -  शेखा जी  के वंशज शेखावत कहलाते हैँ। शेखा जी ...